Dilip Koranne
Jun 7, 2026
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चतुर्थ भावस्थ केतु — १२ लग्नों अनुसार शास्त्रीय भावार्थ
१. मेषलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मेष�...
चतुर्थ भावस्थ केतु — १२ लग्नों अनुसार शास्त्रीय भावार्थ
१. मेषलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मेष�...
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चतुर्थ भावस्थ केतु — १२ लग्नों अनुसार शास्त्रीय भावार्थ
१. मेषलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मेषलग्ने चतुर्थे तु केतुः गेहसुखापहः।
मातृस्नेहे क्षयो नित्यं चित्ते चञ्चलता भवेत्॥”
अर्थ —
मेष लग्न में चतुर्थ भावस्थ केतु गृहसुख में कमी, मातृपक्ष से दूरी तथा मानसिक अस्थिरता दे सकता है। व्यक्ति एक स्थान पर टिकने में कठिनाई अनुभव करता है।
२. वृषभलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “वृषलग्ने चतुर्थे तु केतुः भूमिविचक्षणः।
बाह्यसौख्ये स्थितोऽप्यन्तः शून्यभावसमन्वितः॥”
अर्थ —
वृषभ लग्न में चतुर्थस्थ केतु भूमि, संपत्ति या वाहन संबंधी समझ देता है, पर भीतर संतोष का अभाव बना रह सकता है। बाहरी सुख होते हुए भी मन पूर्ण तृप्त नहीं होता।
३. मिथुनलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मिथुनस्य चतुर्थे तु केतुः चिन्ताविवर्धकः।
गृहस्थेऽपि मनो नित्यं बहिर्भावं प्रपद्यते॥”
अर्थ —
मिथुन लग्न में चतुर्थस्थ केतु मानसिक चंचलता और अधिक विचार देता है। व्यक्ति घर में रहते हुए भी मन से कहीं और विचरता रहता है।
४. कर्कलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कर्कटे चतुर्थगे केतौ मातृभावविघातकः।
अन्तर्दुःखसमायुक्तो गृहशान्तिविवर्जितः॥”
अर्थ —
कर्क लग्न में चतुर्थस्थ केतु मातृसुख में बाधा, भावनात्मक पीड़ा तथा गृहस्थ जीवन में मानसिक अशांति दे सकता है।
५. सिंहरग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “सिंहलग्ने चतुर्थे तु केतुः मानभ्रमान्वितः।
गेहे यशसि चिन्ताश्च मातृपक्षे विरोधकृत्॥”
अर्थ —
सिंह लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर-परिवार में सम्मान की चिंता देता है। माता अथवा परिवार में अहंकारजनित मतभेद संभव हैं।
६. कन्यालग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कन्यायां चतुर्थगे केतुः सूक्ष्मगेहविचारकः।
नित्यं दोषान्वितं चित्तं शान्तिहीनं प्रजायते॥”
अर्थ —
कन्या लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर, व्यवस्था और जीवन में अत्यधिक सूक्ष्मता देता है, परंतु मानसिक शांति में कमी रहती है।
७. तुलालग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “तुलालग्ने चतुर्थे तु केतुः सौख्यविभेदकः।
बाह्यहास्यसमायुक्तोऽन्तः क्लेशसमन्वितः॥”
अर्थ —
तुला लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को बाहर से संतुलित और प्रसन्न दिखाता है, पर भीतर मानसिक द्वंद्व और गृहस्थ अशांति बनी रह सकती है।
८. वृश्चिकलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “वृश्चिकस्य चतुर्थे तु केतुः गूढगेहनायकः।
भूमिरहस्यविज्ञाता मातृस्नेहे क्षयो भवेत्॥”
अर्थ —
वृश्चिक लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को भूमि, गुप्त विषयों या शोध से जोड़ सकता है। माता से दूरी या भावनात्मक अलगाव संभव है।
९. धनुलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “धनुषि चतुर्थगे केतुः धर्मगेहनिवेशकृत्।
गृहेष्वनास्थचित्तश्च यात्रायां रमते सदा॥”
अर्थ —
धनु लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को स्थिर गृहजीवन से अधिक यात्राओं, तीर्थों और आध्यात्मिक वातावरण की ओर आकर्षित करता है।
१०. मकरलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मकरे चतुर्थगे केतुः कर्मचिन्तापरायणः।
गेहसौख्यं न्यूनमेव चित्ते गाम्भीर्यमधिकम्॥”
अर्थ —
मकर लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर की अपेक्षा कर्म और उत्तरदायित्वों में अधिक व्यस्त रखता है। मानसिक गंभीरता बढ़ती है।
११. कुम्भलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कुम्भस्य चतुर्थगे केतुः लोकोत्तरविचारवान्।
गेहे वैचित्र्यमाप्नोति मातृभावे विचञ्चलः॥”
अर्थ —
कुंभ लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को असामान्य गृहजीवन, अलग सोच तथा पारिवारिक परंपराओं से भिन्न मार्ग की ओर ले जा सकता है।
१२. मीनलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मीनलग्ने चतुर्थे तु केतुः भक्तिसमन्वितः।
तीर्थवासरतो नित्यं गृहेष्वल्परतिर्भवेत्॥”
अर्थ —
मीन लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को आध्यात्मिक वातावरण, तीर्थ, ध्यान और आंतरिक शांति की ओर आकर्षित करता है। सांसारिक गृहसुख में विशेष आसक्ति नहीं रहती।
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चतुर्थ भावस्थ केतु — १२ लग्नों अनुसार शास्त्रीय भावार्थ
१. मेषलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मेषलग्ने चतुर्थे तु केतुः गेहसुखापहः।
मातृस्नेहे क्षयो नित्यं चित्ते चञ्चलता भवेत्॥”
अर्थ —
मेष लग्न में चतुर्थ भावस्थ केतु गृहसुख में कमी, मातृपक्ष से दूरी तथा मानसिक अस्थिरता दे सकता है। व्यक्ति एक स्थान पर टिकने में कठिनाई अनुभव करता है।
२. वृषभलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “वृषलग्ने चतुर्थे तु केतुः भूमिविचक्षणः।
बाह्यसौख्ये स्थितोऽप्यन्तः शून्यभावसमन्वितः॥”
अर्थ —
वृषभ लग्न में चतुर्थस्थ केतु भूमि, संपत्ति या वाहन संबंधी समझ देता है, पर भीतर संतोष का अभाव बना रह सकता है। बाहरी सुख होते हुए भी मन पूर्ण तृप्त नहीं होता।
३. मिथुनलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मिथुनस्य चतुर्थे तु केतुः चिन्ताविवर्धकः।
गृहस्थेऽपि मनो नित्यं बहिर्भावं प्रपद्यते॥”
अर्थ —
मिथुन लग्न में चतुर्थस्थ केतु मानसिक चंचलता और अधिक विचार देता है। व्यक्ति घर में रहते हुए भी मन से कहीं और विचरता रहता है।
४. कर्कलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कर्कटे चतुर्थगे केतौ मातृभावविघातकः।
अन्तर्दुःखसमायुक्तो गृहशान्तिविवर्जितः॥”
अर्थ —
कर्क लग्न में चतुर्थस्थ केतु मातृसुख में बाधा, भावनात्मक पीड़ा तथा गृहस्थ जीवन में मानसिक अशांति दे सकता है।
५. सिंहरग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “सिंहलग्ने चतुर्थे तु केतुः मानभ्रमान्वितः।
गेहे यशसि चिन्ताश्च मातृपक्षे विरोधकृत्॥”
अर्थ —
सिंह लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर-परिवार में सम्मान की चिंता देता है। माता अथवा परिवार में अहंकारजनित मतभेद संभव हैं।
६. कन्यालग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कन्यायां चतुर्थगे केतुः सूक्ष्मगेहविचारकः।
नित्यं दोषान्वितं चित्तं शान्तिहीनं प्रजायते॥”
अर्थ —
कन्या लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर, व्यवस्था और जीवन में अत्यधिक सूक्ष्मता देता है, परंतु मानसिक शांति में कमी रहती है।
७. तुलालग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “तुलालग्ने चतुर्थे तु केतुः सौख्यविभेदकः।
बाह्यहास्यसमायुक्तोऽन्तः क्लेशसमन्वितः॥”
अर्थ —
तुला लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को बाहर से संतुलित और प्रसन्न दिखाता है, पर भीतर मानसिक द्वंद्व और गृहस्थ अशांति बनी रह सकती है।
८. वृश्चिकलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “वृश्चिकस्य चतुर्थे तु केतुः गूढगेहनायकः।
भूमिरहस्यविज्ञाता मातृस्नेहे क्षयो भवेत्॥”
अर्थ —
वृश्चिक लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को भूमि, गुप्त विषयों या शोध से जोड़ सकता है। माता से दूरी या भावनात्मक अलगाव संभव है।
९. धनुलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “धनुषि चतुर्थगे केतुः धर्मगेहनिवेशकृत्।
गृहेष्वनास्थचित्तश्च यात्रायां रमते सदा॥”
अर्थ —
धनु लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को स्थिर गृहजीवन से अधिक यात्राओं, तीर्थों और आध्यात्मिक वातावरण की ओर आकर्षित करता है।
१०. मकरलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मकरे चतुर्थगे केतुः कर्मचिन्तापरायणः।
गेहसौख्यं न्यूनमेव चित्ते गाम्भीर्यमधिकम्॥”
अर्थ —
मकर लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को घर की अपेक्षा कर्म और उत्तरदायित्वों में अधिक व्यस्त रखता है। मानसिक गंभीरता बढ़ती है।
११. कुम्भलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “कुम्भस्य चतुर्थगे केतुः लोकोत्तरविचारवान्।
गेहे वैचित्र्यमाप्नोति मातृभावे विचञ्चलः॥”
अर्थ —
कुंभ लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को असामान्य गृहजीवन, अलग सोच तथा पारिवारिक परंपराओं से भिन्न मार्ग की ओर ले जा सकता है।
१२. मीनलग्ने चतुर्थस्थः केतुः
> “मीनलग्ने चतुर्थे तु केतुः भक्तिसमन्वितः।
तीर्थवासरतो नित्यं गृहेष्वल्परतिर्भवेत्॥”
अर्थ —
मीन लग्न में चतुर्थस्थ केतु व्यक्ति को आध्यात्मिक वातावरण, तीर्थ, ध्यान और आंतरिक शांति की ओर आकर्षित करता है। सांसारिक गृहसुख में विशेष आसक्ति नहीं रहती।